Sunday, 16 November 2014

चिट्ठी : मेरे बच्चे को



मेरे लाडले,

              खुश हो न तुम ,

                         अल्लाह मियाँ की जन्नत में तो सुना है, सब खुश ही रहते हैं। अम्मा को शायद कभी कभी याद करते होगे, (ऐसा मुझे लगता है , क्योंकि कभी कभी  बेवजह तुम्हारी नन्न्हीं आँखें भरी हुई दिखती हैं) मगरअम्मा को तो  तुम हर  वक़्त बहुत बहुत याद आते हो.  जब भी किसी खिलौने की दुकान  के नज़दीक से गुज़र होती है, तुम अपनी माँ पर पूरी तरह छा जाते हो. कल तुम्हारे लिए " नन्न्हीं सी बत्तख माँ " खरीदी और पास खड़े छोटे से बच्चे को बाँट दी। उसकी माँ उसे खिलौने नहीं दिला सकती न, वह बहुत गरीब है बेटू! मगर तुम्हारी माँ तो उससे भी ज़्यादा गरीब है,  क्योंकि तुम तो उससे बहुत दूर हो.

                     मेरे चाँद ! तुम्हे पता है, कल तुम्हारी ममा ने क्या किया ! तुम्हारी याद में नन्हे नन्हे से   बच्चों के लिए पेंसिल्स और बुक्स खरीद के दी. वही सारी पेंन्सिल्स जो शायद तुम मां के पास होते तो मचल मचल कर मांगते, वही सारे चॉकलेट्स , फ्रूट्स , शूज़ और ड्रेसेज़ जो माँ तुम्हारे  लिए खरीदती।  कल तुम्हारे लिए कितने सारे चॉकलेट्स बांटे, सच्ची!!! मज़ा आ गया।  फिर रात  पड़े , वही अकेले घर में सूना सा पालना , जो माँ  ने तुम्हारे लिए खरीदा था, उससे लिपट माँ के आंखॉ से कितनी देर  आँसू  निकले , तुम्हे तो अंदाज़ भी  नही. नन्हे नन्हे कपडे, छोटे छोटे स्वेटर, प्यारे प्यारे शूज़ , सब के सब तुम्हारी अम्मी जान ने  तुम्हारे लिए खरीद के रखे थे, सब के सब माँ को कितना रुलाते हैं, तुम तो अंदाज़ भी नहीं लगा सकते,  और वह सपना!  जिसमे  तुम नीम के घने से दरख्त के नीचे ,अपने नन्हे मुन्ने पैर बनाते भाग रहे हो, और मैं ! तुम्हे कितनी मोहब्बत से देख रही हूँ, वह भी तो अधूरा रह गया न प्यारे! कितना कुछ , तुम्हे अपने  हाथों से खिलाने - पिलाने का सुख, तुम्हारे लाड उठाने का सुख , और तुम्हे गोदी में ले , दुलराने  का सुख सब जैसे एक पल में ही गुम  हो  गया।   तुम्हे पता है, जब तुम मेरे अंदर आकार ले रहे थे,  सुबह उठ कर चिडियों  की आवाज़ें सुनने का मुझे जैसे शौक हो गया था. तुम तो  मुझे छोड़ गए पर चिड़ियें अब भी मुंडेर  पर आती हैं, सब की सब तुम्हारी माँ की सहेलियां हैं, मै अब भी उन्हें प्यार करती हूँ , तुम्हारे लिए. तुम्हारे आने की खबर पर  रोपे  पौधों में अब सब्ज़े फूट गए हैं, पर तुम्हारी माँ की आस की कोपल तुम्हारे न आने से मुरझा गयी है।  मगर तुम घबराना मत।  तुम्हारी माँ ज़िंदा है, खुश रहने की भी कोशिश करती है.  आसपास के सारे बच्चों  से मोहब्बत करती है, उन सबमे अपना आप गुम कर देना चाहती है , आखिर वह तुम जैसे बहादुर बच्चे की  मम्मी  है, जो बहुत सारे बच्चो को प्रेम मिले इसलिए अपनी मम्मी  को छोड़ कर बहुत दूर चला गया है.   बस  आसमान  में चन्दा बन , दूर से अपनी माँ को देख कर खुश होता है.  मै  भी  सारे बच्चों से प्रेम करती हूँ, तुम्हारे लिये।    

सुनो! खुश तो रहते हो न वहाँ ! मैंने सुना है,  दूध की नहरे,  टॉफ़ियों की दीवारें , खेल -खिलौने, परियाँ, मज़े मज़े के लोग, हरियाली सब है वहां ! अल्लाह मिया सब का बड़ा ध्यान रखते हैं, किसी को माँ की याद नहीं आती। फिर भी माँ की जान ! मुझे तुम्हारी फिक्र होती है,  कौन तुम्हे नहलाता होगा, किस से ज़िद करते होगे, कभी कभी कोई खाना अच्छा नहीं लगता , तब क्या करते होगे!!! कहीं भूखे तो नहीं सो जाते! सर्द में रूठ कर , बिना लिहाफ ओढ़े पूरी रात तो नही पड़े रहते , कभी कोई फरिश्ता मनाने आता है, या उस वक़्त माँ की याद आती है. और दौड़ने ,भागने और दूर चले जाने  की तो तुम्हे बहुत आदत है,( तब ही तो कोख  से क़ब्र तक का फैसला मिनटों में तय कर गए ) देखो! खेलते खेलते कहीं अल्लाह मियाँ के बगीचे से भी बहुत दूर मत निकल जाना , वर्ना कहीं ऐसा न हो कि  उनकी पहुँच से भी……
 
                    अच्छा जानां !  खुश  रहना , वहाँ सबको परेशान मत करना और बहुत याद आये तो, अल्लाह मिया से कहना "अब माँ को भी बुला लो, मुझे याद आती है." और शाम को  चाँद के  हाले  से ,  जो नूर की चिट्ठियाँ  भेजते हो न! उन्हें  लिखते रहना , उनसे तुम्हारी माँ  को बड़ी स तसल्लियाँ मिलती हैं , लिखते रहना।

               औरक्या लिखूं, बहुत सारी बाते हैं, मगर सुबह उठ कर स्कूल भीजाना है, अपना ध्यान रखना और तुम्हारे सब साथियों को मेरा प्यार देना . मुझे विश्वास है, एक दिन हम मिलेंगे।  प्यार।

                                                                                                             तुम्हारी
                                                                                                                      मम्मी   
  

Sunday, 30 March 2014











वो एक लम्हा कि मेरे बच्चे ने 'माँ ' कहा मुझको 
मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई

                                                  - परवीन शाकिर 

Wednesday, 1 January 2014

खुशामदीद २०१४






कभी नरमी, कभी सख्ती , कभी उजलत, कभी देर 
वक़्त ऐ दोस्त ! बहरहाल गुज़र  जाता है 
लम्हा -लम्हा नज़र आता है कभी एक साल 
कभी लम्हों की तरह साल गुज़र जाता है  

                                                              -नए साल की नयी आमद मुबारक 

Wednesday, 13 November 2013

अपने अजन्मे बच्चे के नाम ......(बाल दिवस मुबारक )














होने लगा था 
मुझे गुब्बारों  से प्यार 
रोकने लगी थी मैं 
सड़क से गुज़रते चर्ख़ी वाले को 
झाँकने लगी थी मै 
ख़्वाबों के झरोखों में 
 जब तुम्हारी धड़कने
मेरी धड़कनो में शामिल हो 
धड़कने लगीं थीं

फिर से सीखने शुरू 
कर दिए थे मैंने 
बच्चों के खेल
फिर से बनाने लगी थी मैं 
काग़ज़ के खिलौने 
परियों की कहानियों में गुम 
भूतों के किरदार 
फिर से ज़िंदा होने लगे थे 
मेरे इर्द -गिर्द 
जब तुम्हारी साँसे 
मेरी साँसों में घुलने लगीं थी

फिर से बनने लगे थे 
नींद की नदी पर
लोरियों के पुल
फिर से सजने लगी थी 
अलिफ़ लैला की दुनिया
लकड़ी के घोड़े पर चढ़
इन्द्रधनुष की क़ामत 
नाप आते थे मेरे ख़याल
जब मैं सोंचने लगी थी 
तुम्हारे लिए नाम


कुशादा होने 
लगा था मेरा आस्मां 
उगने लगा था मेरा सूरज 
वक़्त से पहले 
 डरने लगी थी मै 
करवट लेने में भी 
सोंचती रहती थी 
मुस्तक़िल तुमको


फिर एक दिन
 मेरा हाथ पकड़ जब
मुझे बतलाया डॉक्टर साहिबा ने 
नहीं आ रहे हो तुम 
कि अभी अर्श पर
नहीं हुआ वक़्त 
तुम्हारी आमद का
छनाक से 
टूटा था , मेरे अंदर कुछ 
 
फिर बाँट दी मैंने
सारी उमंगें 
मेरे इर्द गिर्द बच्चों को 
जी लीं मैंने
सारी कहानियाँ 
अपने नज़दीक के 
तमाम नन्हे- मुन्नों के साथ
सजा लिया मैंने 
सारे बच्चों के साथ 
तुम्हारे हिस्से का प्यार 


मैं रोई नहीं 
नहीं बहाये मैंने आंसू
मुझे लगता है 
गलत कहती है डॉक्टर
तुम तो यहीं हो 
यही कही 
हर ख्वाब, हर खिलौने में  
रंग, फूल , तितली 
सब में शामिल
घर के सामने से 
गुज़र कर 
स्कूल को जाते 
हर बच्चे में   
कायनात की
हर नयी उमंग में 
फ़िज़ाँ की 
हर नयी कोंपल  में
मैंने तो तुम्हे 
इस दुनिया के हर नन्हे में ढूंढ लिया है
   
-मम्मी 


 
 
 


 

 

 
 

  

Friday, 1 November 2013

मै रंग शर्बतों का , तू मीठे घाट का पानी …।



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"अब सिर  पर दीवाली खड़ी है, काम, बच्चे , कपडे, रिश्तेदार भगवान् सभी को निभाना मनाना है, और उप्पर से इनकी किट किट।"   भगवान् जाने मैं  कैसे निभा गयी  इनसे।  दीप्ती  बड़ बड़  करती कमरे से आँगन  तक आयी और तुलसी चौरा झाड़ने लगी।  " चली जाओ अपनी माँ के घर , किसने निबाहने को पीले चावल बांटे है " प्रसाद जी कौनसा पीछे रहने वाले थे, अपने उप्पर परफ्यूम की आख़री बूँद यों डाली जैसे, ताबूत में कील ठोंकी ,और यह जा वह जा।

दीप्ति  पूरा दिन लिपाई पुताई कर सिसकती रही, बच्चों  को खाना दे होमवर्क करवा ट्यूशन भेजा, कचरा साफ़ कर रांगोली डाली, नहा धो, बेडरूम साफ़ कर लेट गयी।  नहीं खाया तो बस खाना।
 सर में दर्द , लगता था जैसे , माईग्रेन ने आ जकड़ा।

शाम हुई , प्रसाद जी आये ,देखा बत्ती बंद है, मिकी चिंकू अपने कमरे में पढ़ रहे हैं , दीप्ती सो रही है। हौले  से कमरे में गए, धीमे से दीप्ती के बालों में हाथ फेरा। " दीप्ती! तुम्हारी तबियत तो ठीक है न!"  जानता हूँ काम के टेंशन में कुछ खाया भी नहीं होगा " 

धीमे धीमे सर दबाते प्रसाद ऐसे लग रहे थे जैसे मिकी , चिंकू से भी छोटे बच्चे  हों।  दीप्ती जो शाम को ही मायके जाने का प्रण  ले बैठी थी बड़ी बड़ी आँखों से अचरझ से उन्हें देख रही थी, और वह उसके लिए खाना ऐसे लगा रहे थे, मानो करवाचौथ का व्रत  खुलवा रहे हो।
  
मिकी अपने मोबाइल के गाने सुन रही थी , धीमे धीमे प्रसाद भी गुनगुना रहे थे, " मैं  रंग शर्बतों का…… "
-सहबा         

Thursday, 3 October 2013

सतपुड़ा के घने जंगल.....

        
        नींद मे डूबे हुए से
        ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

                सड़े पत्ते, गले पत्ते,
                हरे पत्ते, जले पत्ते,
                वन्य पथ को ढँक रहे-से
                पंक-दल मे पले पत्ते।
                चलो इन पर चल सको तो,
                दलो इनको दल सको तो,
                ये घिनोने, घने जंगल
                नींद मे डूबे हुए से
                ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताऐं,
डालियों को खींच खाऐं,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाऐं।
सांप सी काली लताऐं
बला की पाली लताऐं
लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

                मकड़ियों के जाल मुँह पर,
                और सर के बाल मुँह पर
                मच्छरों के दंश वाले,
                दाग काले-लाल मुँह पर,
                वात- झन्झा वहन करते,
                चलो इतना सहन करते,
                कष्ट से ये सने जंगल,
                नींद मे डूबे हुए से
                ऊँघते अनमने जंगल|

अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कम्प से कनकने जंगल,
 
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

                इन वनों के खूब भीतर,
                चार मुर्गे, चार तीतर
                पाल कर निश्चिन्त बैठे,
                विजनवन के बीच बैठे,
                झोंपडी पर फ़ूंस डाले
                गोंड तगड़े और काले।
                जब कि होली पास आती,
                सरसराती घास गाती,
                और महुए से लपकती,
                मत्त करती बास आती,
                गूंज उठते ढोल इनके,
                गीत इनके, बोल इनके

                सतपुड़ा के घने जंगल
                नींद मे डूबे हुए से
                उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फ़ैला हुआ सा,
मृत्यु तक मैला हुआ सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|

                धँसो इनमें डर नहीं है,
                मौत का यह घर नहीं है,
                उतर कर बहते अनेकों,
 
                कल-कथा कहते अनेकों,
                नदी, निर्झर और नाले,
 
                इन वनों ने गोद पाले।
                लाख पंछी सौ हिरन-दल,
                चाँद के कितने किरन दल,
                झूमते बन-फ़ूल, फ़लियाँ,
                खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
                हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
                पूत, पावन, पूर्ण रसमय
                सतपुड़ा के घने जंगल,
 
                लताओं के बने जंगल।
- भवानी प्रसाद मिश्र

Wednesday, 28 August 2013

प्रेम ! तुम कृष्ण ही रहे ……

 

मै  बस्स 
नींद में बहली 
मै बस्स  ख्व़ाब में चली 
मै पारिजात की डाल
 पर कांपती कली 
स्नेह के दुश्मन 
काँटों संग पली 
और प्रेम!
तुम मुझे नहीं मिले 
प्रेम तुम कृष्ण ही रहे ……

तुम्हे कल्नाओं में जीती 
सचमुच  में आंसू पीती
जीवन डगर पर 
एकाकी बढ़ती रही
और प्रेम!
तुम मुझे नहीं मिले 
प्रेम तुम कृष्ण ही रहे ……
सोचती रही

राह ख़त्म होगी 
और बस एक अगले मोड़ पर
तुम और मै 
पर तुम कहाँ!
और प्रेम!
तुम मुझे नहीं मिले 
प्रेम तुम कृष्ण ही रहे ……

अब सोचती हूँ 
वह खुशबू 
जिसके सहारे काटे मैंने दिन 
वह धुन जिससे 
पाया मैंने आत्मबल 
वह टेक, वह सहारा 
वह सांझ, वह किनारा 
वह तुम  थे 
जो बहलाते रहे मुझे 
मुझसे दूर खड़े 
बिना कुछ पाने की आशा में 
पर मेरे खुशी के दिनों में 
मुझसे दूर 
और प्रेम!
तुम सचमुच  
 कृष्ण ही रहे ……
  

- सहबा